
कंबल वितरण या प्रचार की ठंड? 6 डिग्री और 12 डिग्री के फर्क ने खोली ‘मानवीय चेहरे’ की हकीकत
शेखर सिद्दीकी
सर्दी के मौसम में जब तापमान 6 डिग्री तक गिरता है, तब जिम्मेदारों की संवेदनाएं गर्म कमरों और मोटे कंबलों में दुबकी रहती हैं। लेकिन जैसे ही पारा 12 डिग्री छूता है, ‘कड़ाके की सर्दी’ का शोर मचने लगता है और गरीबों को कंबल बांटने की याद अचानक ताजा हो जाती है। सवाल यह है कि क्या यह मदद है या प्रचार की सस्ती लोकप्रियता?सर्द रातों में खुले आसमान के नीचे जिंदगी काट रहे जरूरतमंदों के लिए ठंड का हर एक डिग्री जानलेवा होता है। 6 डिग्री तापमान में जहां शरीर कांपता है, वहीं 12 डिग्री में भी ठंड का असर कम नहीं होता। फर्क सिर्फ इतना है कि 6 डिग्री में ‘जिम्मेदार’ अपने गुलगुले कंबलों और गर्म कमरों में सर्दी का आनंद लेते हैं, जबकि 12 डिग्री में कैमरों की मौजूदगी के बीच ‘मानवीय चेहरा’ दिखाने का वक्त आ जाता है।हर साल यही दृश्य दोहराया जाता है। सुबह होते ही अखबारों और सोशल मीडिया पर कंबल वितरण की तस्वीरें छा जाती हैं। पोस्टर लगते हैं, बैनर टंगते हैं, और लिखा जाता है— “जिम्मेदारों का मानवीय चेहरा”। अपनी पूंजी से कंबल बांटने का दावा किया जाता है, वाह-वाही लूटी जाती है और लोकप्रियता की फसल सस्ती मेहनत में काट ली जाती है।दान की तुलना भी शुरू हो जाती है— “हमने सैकड़ों को कंबल दिए, तुमने तो मुश्किल से पांच लोगों को खिचड़ी दान की होगी।” मीडिया ग्रुपों में रिश्तेदारों और परिचितों को संदेश भेजे जाते हैं, मानो मदद नहीं बल्कि उपलब्धि का प्रमाणपत्र बांटा जा रहा हो। मकर संक्रांति जैसे पर्व भी प्रचार का जरिया बन जाते हैं, जहां सेवा से ज्यादा प्रदर्शन हावी नजर आता है।सवाल यह नहीं कि कंबल बांटे गए या नहीं, सवाल यह है कि समय पर क्यों नहीं बांटे गए? जब ठंड अपने चरम पर थी, तब संवेदनाएं कहां थीं? क्या मदद का पैमाना तापमान नहीं, बल्कि कैमरे और सुर्खियां तय करती हैं?कवि की पंक्तियों में कही जाए तो—“आईना हूं, दाग दिखाऊंगा चेहरे के, जिसे बुरा लगे वह सामने से हट जाए।”यही आईना आज समाज के सामने है। जहां पहले से चोटों के निशान हैं, वहीं बार-बार चोट मारी जा रही है— संवेदनहीनता की, दिखावे की, और प्रचार की।जरूरतमंदों को मदद चाहिए, तस्वीरें नहीं। ठंड 6 डिग्री हो या 12, इंसानियत का तापमान हर वक्त बराबर रहना चाहिए। वरना जिंदगी यूं ही गुजारी जाती रहेगी— जैसे कोई जंग हारी जा रही हो।
कंबल वितरण या प्रचार की ठंड 6 डिग्री और 12 डिग्री के फर्क ने खोली ‘मानवीय चेहरे’ की हकीकत

